सोशल मीडिया और सरकारी नौकरी: जानिए सभी ज़रूरी बातें
पूरे देश की जनता जब चुनावी रंग में रंगी हो तब सरकारी कर्मचारियों पर राजनीतिक अभिव्यक्ति के आरोप के तहत निलंबन की गाज क़ानून-सम्मत नहीं है. उत्तर प्रदेश में आपत्तिजनक फ़ेसबुक पोस्ट और व्हाट्सऐप मैसेजों के लिए कई शिक्षक और शिक्षा अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है. दूसरी ओर, नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार की राजनीतिक टिप्पणी पर कोई सख़्ती नहीं की गई. सवाल यही है कि सरकारी कर्मचारियों की राजनीतिक अभिव्यक्ति की क्या क़ानूनी सीमाएं हैं? सज़ा देने के मामले में समानता के सिद्धांत का पालन क्यों नहीं होता? संविधान के अनुच्छेद-19-ए के तहत, कुछ अपवादों को छोड़कर, सभी नागरिकों को बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी का मूल अधिकार है. सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए राज्य, केंद्र और अखिल भारतीय स्तर पर सेवा नियम बनाए गए हैं. इन नियमों का मक़सद ये है कि सरकारी कर्मचारी बग़ैर भेदभाव के निष्पक्षता से काम कर सकें, इसलिए वे राजनीतिक दलों के सदस्य नहीं बन सकते. इन नियमों के बावजूद केंद्र और राज्यों में सरकार की मंशा के अनुसार अफसरशाही की जी-हुजूरी का रिवाज बनना दुर्भाग्यपूर्ण है. ज...