असम: मोदी सरकार के किस कदम से घबराए ब्राह्मण, मुस्लिम

असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर और नागरिकता क़ानून में संशोधन के बाद एक नया विवाद शुरू हो गया है. ये विवाद केंद्र सरकार के छह जातीय समूहों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के फ़ैसले को लेकर हो रहा है.

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने असम सरकार से कहा है कि वो राज्य में अनुसूचित जाति में शामिल होने की मांग कर रहे छह जनजातीय समूहों को इस सूची में शामिल करने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजे.

केंद्र सरकार अपनी कैबिनेट बैठक में कोच, राजबोंगशी, ताई अहोम, चूटिया, मटक, मोरान और ट्री ट्राइब्स जातीय समूहों को अनूसूचित जाति में शामिल करने के विधेयक को पहले ही मंज़ूरी दे चुकी है.

हालांकि अभी ये विधेयक सदन से पारित नहीं हुआ है.

असम में इन समूहों को अनूसूचित जाति में शामिल करने को लेकर शुरू हुआ विवाद बड़ा रूप ले सकता है.

इन जातीय समूहों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के फ़ैसले का सामान्य वर्ग के साथ पहले से इस सूची में शामिल समुदाय भी विरोध कर रहे हैं.

सामान्य वर्ग के लोगों को डर है कि इन समूहों के अनुसूचित जाति में शामिल होने के बाद आरक्षित समूहों की आबादी पचास फ़ीसदी के क़रीब हो जाएगी और इसका असर राजनीति, शिक्षा और सरकारी नौकरियों में मिलने वाले आरक्षण पर पड़ेगा.

क्षत्रिय समुदाय से जुड़े और असम गण परिषद के स्थानीय नेता असमिया फ़िल्मों के निर्माता-निर्देशक लुइत बर्मन ने बीबीसी से बात की.

उन्होंने कहा, "हम इन समूहों को अनुसूचित जातियों में शामिल किए जाने का विरोध तो नहीं कर रहे हैं लेकिन हम चाहते हैं कि हमारे हितों की रक्षा के लिए हमें भी संवैधानिक गारंटी मिले."

वो कहते हैं, "हम क्षत्रिय हैं और प्राचीनकाल से असम में रह रहे हैं. अगर इन समूहों को अनुसूचित जाति का दर्जा मिला तो सामान्य वर्ग के लोग राजनीतिक रूप से वंचित हो जाएंगे. अभी विधानसभा की 126 सीटें हैं. अगर ये समूह आरक्षित वर्ग में शामिल हुए तो आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ेगी जिसका सीधा असर सामान्य वर्ग के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर होगा. हम अपने लिए आरक्षण नहीं चाहते हैं बल्कि संवैधानिक सुरक्षा चाहते हैं."

असम में मुसलमानों की भी एक बड़ी आबादी रहती है.

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक़ असम में क़रीब 34 फ़ीसदी मुसलमान रहते हैं.

स्थानीय पत्रकार और कार्यकर्ता मोइनउद्दीन कहते हैं, "जो आशंकाएं ब्राह्मण समुदाय को हैं, वो हमें भी हैं. मुसलमान राजनीतिक रूप से पहले ही पिछड़े हैं. आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ने से राजनीति में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व और भी कम हो जाएगा."

वो कहते हैं, "मौजूदा सरकार का रवैया असम के मुसलमानों के प्रति पहले ही नकारात्मक है. अगर ये छह समूह आरक्षित वर्ग में आते हैं तो इसका सबसे ज़्यादा असर मसुलमानों पर ही पड़ेगा, क्योंकि आरक्षण की वजह से उनका प्रतिनिधित्व और सीमित होगा."

वहीं इन छह समूहों में शामिल मोरान समुदाय के छात्र नेता अरुणज्योति मोरान का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी इन जातीय समूहों को आरक्षित वर्ग में शामिल करने के अपने वादे को पूरा करने से अभी दूर है.

वो कहते हैं, "ये समूह लंबे समय से अनुसूचित जाति में शामिल किए जाने की मांग करते रहे हैं. भाजपा हमसे वादा करती रही है. फ़रवरी 2016 में हुई एक बैठक में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने इन समूहों के प्रतिनिधियों से कहा था कि सरकार उन्हें अनुसूचित वर्ग में लाने के लिए प्रतिबद्ध है. लेकिन ये वादा पूरा होते हुए नहीं दिख रहा है."

वो कहते हैं, "सरकार ने कैबिनेट में इससे जुड़े विधेयक को पारित किया है. लेकिन ऐसा 2019 चुनावों को ध्यान में रखकर किया गया है. अगर सरकार गंभीर होती तो विधेयक को सदन में पारित करवा लेती. ये विधेयक राज्यसभा में आया और इस पर चर्चा तक नहीं हो सकी."

इसी बीच असम में पहले से ही अनुसूचित जाति में शामिल समूहों ने भी इस विधेयक का विरोध करना शुरू कर दिया है. असम में जातीय संस्थाओं की समन्वय समिति ने शुक्रवार को इस विधेयक के ख़िलाफ़ राज्यव्यापी बंद बुलाया था.

वहीं बोडो समुदाय के संगठन भी इन समूहों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिए जाने का विरोध कर रहे हैं.

बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद और बोडोलैंड पीपुल्स पार्टी के नेताओं ने अपनी चिंताएं ज़ाहिर करने के लिए गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाक़ात की है.

ऐसे में पहले से ही राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर और नागरिकता क़ानून में संशोधन विधेयक से पैदा हुए विवाद की आंच में झुलस रहे असम में छह जातीय समूहों को अनुसूचित जाति में शामिल करना एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा हो सकता है.

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